क्या गरीब मरीजों का इलाज रोकना जायज है

65-75 लाख की सरकारी सहायता लेने के बाद, क्या गरीब मरीजों का इलाज रोकना जायज है?

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मध्य प्रदेश में मेडिकल की पढ़ाई के लिए विद्यार्थियों को सरकार की ओर से ₹65 से ₹75 लाख तक की सहायता दी जाती है।

 

यह किसी एक व्यक्ति का पैसा नहीं, बल्कि जनता की मेहनत की कमाई और सार्वजनिक धन है- ताकि हमारे युवा डॉक्टर बनें और समाज की सेवा करें।

 

आज कुछ मेडिकल इंटर्न सिर्फ एक वर्ष की इंटर्नशिप के मानदेय में बढ़ोतरी की मांग को लेकर मरीजों के इलाज से दूरी बना रहे हैं।

 

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इंटर्नशिप प्रशिक्षण का चरण है और इस दौरान उनकी MBBS डिग्री भी अभी पूर्ण नहीं हुई होती।

 

मानदेय बढ़ाने की मांग रखना अधिकार हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अपनी मांग के लिए उस गरीब मरीज को इलाज से वंचित करना उचित है, जो बड़ी उम्मीद लेकर सरकारी अस्पताल पहुंचता है?

 

जिस समाज के सार्वजनिक धन से 65–75 लाख तक की सहायता लेकर डॉक्टर बनने का अवसर मिला हो, क्या उसी समाज के जरूरतमंद मरीजों की सेवा से पीछे हटना उस जिम्मेदारी के साथ न्याय है?

 

डॉक्टर बनने का अर्थ सिर्फ MBBS की डिग्री हासिल करना नहीं है। डॉक्टर की पहचान उसकी संवेदना, सेवा-भाव और उस मरीज के प्रति जिम्मेदारी से होती है, जो उसके सामने इलाज की उम्मीद लेकर खड़ा है।