आज ही के दिन लगा था आपातकाल

….हेमन्त गर्ग……..सेंधवा-आज के दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा कर देश पर एक काला दाग लगा दिया । तानाशाही शासन के आज उस दौर को 50 साल बीत गए पर जख्म के निशान आज भी कायम हैं । उक्त बात पूर्व जिला अध्यक्ष एस वीरा स्वामी ने नपा जनसंपर्क कार्यालय पर दोपहर साढ़े 12 बजे आपातकाल के 50 वर्ष पूर्ण होने पर गोष्ठी के उपरांत व्यक्त की ।
स्वामी ने कहा कि देश में आपातकाल लगाना इंदिरा गांधी की एक बड़ी भूल थी । अपने आप को अपराधी होने से बचने के लिए उन्होंने देश पर आपातकाल लाद कर देश पर काला दाग लगा दिया नागरिकों की व पत्रकारिता की स्वतंत्रता छीन ली । सत्ता का दुरुपयोग कर तानाशाही कर जनता को प्रताड़ित किया । आपातकाल की बात होते ही आपातकाल के जख्म हरे हो जाते हैं ।उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के शासन से भी बत्तर काल था । भाजपा प्रवक्ता सुनील अग्रवाल ने कहा आज से ठीक 50 साल पहले 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया। 21 महीनों का यह दौर संविधान, नागरिक अधिकारों के उल्लंघन, प्रेस की अभिव्यक्ति पर रोक और विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियां का रहा । आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का एक ‘काला अध्याय’ था जो निरंकुश सत्ता के दुरुपयोग, तानाशाही और प्रतिरोध की याद दिलाता है। आपातकाल की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हुई, जिसने गांधी को पद से अयोग्य ठहराया। आपातकाल के बाद हुए घटनाक्रमों ने भारतीय राजनीति में कई अहम बदलाव आए। इसमें कांग्रेस पार्टी का उत्थान और पतन और राष्ट्रीय पटल पर नए राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय दलों का उभार भी शामिल है । नगर मंडल अध्यक्ष राहुल पवार ने कहा कि आपातकाल के बारे में युवा पीढ़ी अनजान हैं । उन्हें भी कांग्रेस के काले कारनामे व सत्ता में बने रहने के लिए देश को भी आपातकाल जैसे कलंकित करने वाली घटना की जानकारी होनी चाहिए । इस लिए भाजपा 50 साल पूर्व आपातकाल को जनता के सामने ला रही है । इस अवसर पर सुरेश गर्ग व श्याम पाटिल ने भी अपने विचार रखे ।
*आपातकाल लागू होने के बाद क्या-क्या हुआ*
आपातकाल का दौर 25 जून 1975 से मार्च 1977 तक था, इस दौरान भारत में नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित थीं। मौलिक अधिकारों का निलंबन, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता शामिल है। विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं की सामूहिक गिरफ्तारी । प्रेस की सेंसरशिप और मीडिया पर नियंत्रण। सरकारी नीतियों के हिस्से के रूप में मजबूर नसबंदी और झुग्गी-झोपड़ी का ध्वंस। 1977 में कांग्रेस पार्टी की महत्वपूर्ण चुनावी हार का सामना किया।
नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रभाव
आपातकाल के प्रभाव गहन थे। मौलिक अधिकारों, जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता का अधिकार शामिल था, को निलंबित कर दिया गया। हजारों लोगों को आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA) के तहत एक बिना मुकदमे के कैद किया गया, और मीडिया को गंभीर सेंसरशिप का सामना करना पड़ा । जय प्रकाश नारायण और जनसंघ के सदस्यों जैसे उच्च-प्रोफाइल विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। जनता ने मजबूर नसबंदियों और झुग्गियों के ध्वंस को देखा, जिसने सरकार के खिलाफ असंतोष को और बढ़ा दिया। जनता में तानाशाही शासन का कोप बन गया था । सरकार के खिलाफ मुंह खोलना अपने आप को सजा देने के समान था । इतना कोप अंग्रेज के शासन में भी नहीं था ।